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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

अपृथ्व्यादिमयं भाति पृथ्व्यादिमयवज्जगत् । यथेदमाऽऽप्रथमतो मृतस्याप्यखिलं तथा ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

दान, धर्म आदि तपस्याओं तथा अन्त्येष्टि क्रिया, श्राद्ध आदि कर्मो का अदृष्ट जहाँ क्रिया हुई उसी प्रदेश में यदि उत्पन्न होता है तो यहाँ पर स्थित लोगों को क्रिया का फल परलोक में कैसे होगा, जो उक्त क्रिया की उत्पत्ति से शून्य है ? तथा अदृष्ट मूर्त देह आदि में प्रीतिजनन से सफल है यह कहिये तो परलोक मेँ स्थित देह में अदृष्ट का अस्तित्व कहाँ है ?