Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
देशकालौ न सर्गेण प्रबुद्धस्येव तौ यथा ।
अणुमात्रमपि व्याप्तौ तथैव परलोकिनः ॥ ३१ ॥
इदं प्रबुद्धविषये स्वानुभूतमपि स्फुटम् ।
जगन्न विद्यते किंचित्कारणं गगने यथा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कहिये कि व्यवहार करनेवाला जीव और उसमें समवाय सम्बन्ध से स्थित उसका
अदृष्ट जिस जगह उसका भोग होता है वहाँ है। यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योकि इस लोक के
देह आदि मूर्तं पदार्थ अन्य लोक तथा अन्य काल में नहीं रहते जिनके आश्रय से व्यवहार करनेवालों
को फल हो सकेगा, यह अर्थ है