Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अप्रबुद्धस्यासदेव यथेदं भाति भासुरम् ।
तथैव सर्गवद्भाति व्योमैव परलोकिनः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इत्यादि असमंजस कैसे समंजस होगा ? मेरे मन में उठे
हुए इन सकल सन्देहो को शीतल और उज्ज्वल वाणी से ऐसे काट डालिये जैसे कि चन्द्रमा
सायंकाल में होनेवाले अन्धकार को शीतल तथा उज्ज्वल कान्ति से काट देता है