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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verses 34–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verses 34–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

शुधराद्रियमाद्याढ्यं खमेव परलोकिनः । अभूतपूर्वमाभाति भूतपूर्ववदाततम् ॥ ३४ ॥ मृतोऽयं पुनरुत्पन्नो यमलोके शुभाशुभम् । भुञ्जेऽहमित्यतिघनं मृतो भ्रान्तिं प्रपश्यति ॥ ३५ ॥ मोक्षोपायानादरिणामेष मोहो न शाम्यति । बोधादवासनत्वेन मोह एष प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥ अप्रबुद्धस्य या संवित्सा धर्माधर्मवासना । ख एव खात्मिका भाति यत्तदेव जगत्स्थितम् ॥ ३७ ॥ न शून्यरूपं न च सत्स्वरूपं ब्रह्माभिधं भाति जगत्स्वरूपम् । तच्चापरिज्ञानवशादनर्थभूतं परिज्ञातवतः शिवात्म ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भगवन्‌, परमात्मा के विषय में उपदेश द्वारा सकल संशयो का विनाश करने से हजारों विरुद्ध फलवाला भी दोनों लोकों में (इस लोक ओर परलोक में) हितकर तथा अविरुद्ध हो जाता है, इसलिए परमवस्तुबोध (परमात्मबोध) मुझे दीजिये आपके सदृश महापुरुषों का समागम मेरे सदृश किसी को साधारण फलप्रद नहीं होता हे, यह अर्थ है