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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

त्वं संकल्पपुरं कृत्वा विनाशयसि तत्क्षणात् । स्वतोऽन्यसंविद्वशतः स्वस्वभावः स ते यथा ॥ १३ ॥ चिद्व्योमकल्पनपुरे यदुन्मज्जनमज्जनम् । स्वभावकचनं तस्य तद्विद्धि विमलं तथा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो मूढ़बुद्धिवाला चार्वाक यह प्रपंच एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाणवाला ही है, प्रत्यक्षातिरिक्त अन्य प्रमाणोंवाला नहीं है, इसलिए श्रुति आदि से सिद्ध जगत्‌ का ग्रहण नहीं करना चाहिए, ऐसा कहता है वह उस युक्तिविहीन, सर्वविरुद्ध तथा अभिज्ञजनों का कर्णकट्टु होने से पत्थर के समान कठोर अपने वचन से ही सकल विद्वानों द्वारा अज्ञानी तथा अन्धे कुएँ का मेढक कहा गया है, क्योकि वह पूर्वापर विचारबुद्धि को ताक में रखकर केवल वर्तमानमात्रगोचर प्रत्यक्ष प्रमाण में ही अपनी बुद्धि से पशु के सदृश स्थित है