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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

संविद्धनस्त्वनाद्यन्तव्योमैव त्रिजगन्नभः । तेनासावद्य यन्नाम करोत्यपि च चेतति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

चार्वाक आदि की उक्ति से सन्देहो की कदापि निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योकि अनुमान आदि प्रमाणो का अंगीकार न करने के कारण उसकी उक्ति युक्तिशून्य है । वेद आदि तो गुरुमुख से पूछे जाने पर सकल सन्देहो की निवृत्ति द्वारा परम पुरुषार्थ के प्रदान में समर्थ हैं, कारण कि वे अपने अनुभव से पूर्ण इस मेरे द्वारा कही हुई दृष्टि का प्रतिपादन करते हैं, ऐसा कहते हैं। वेद तथा तत्त्वज्ञानी जन जब पूछे जाते हैं तब अपने अनुभव से परिपूर्ण इस मेरे द्वारा कही गई दृष्टि का ऐसे प्रतिपादन करते हैं जैसे कि ये सब संशय नष्ट हो जाते हैं