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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 24–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verses 24–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 24-27

संस्कृत श्लोक

जरामरणहन्तृणि क्षणान्यत्र पृथक्पृथक् । भवन्त्विति यथैतानि सन्ति त्वत्कल्पनापुरे ॥ २४ ॥ ब्रह्मसंकल्पनगरे स्वभावा उदितास्तथा । ओषधीनां पदार्थानां सर्वेषां च जगत्त्रये ॥ २५ ॥ न संकल्पयिता राजन्संकल्पनगरे स्वयम् । तृणं तृणं कल्पयति बालः क्रीडनकानिव ॥ २६ ॥ स्वयं स्वभाव एवैष चिद्धनस्यास्य सुस्फुटम् । यद्यत्संकल्पयत्याशु तत्र तेऽवयवा अपि ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

है वैसे ही निष्कारण चिन्मात्र उन्मेष जगत्‌ के रूप में भासता हे