Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 32–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verses 32–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 32-35
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हिन्दी अर्थ
इसी तरह तत्त्वज्ञानी के विषय में जगत् भी नहीं व्याप्त होता है, ऐसा कहते है।
स्पष्टरूप से अपने द्वारा अनुभूत भी यह जगत् प्रबुद्ध के (तत्त्वज्ञानीके) विषय में वैसे ही कुछ नहीं
है जैसे कि आकाश के विषय में कारण कुछ नहीं है । जैसे अप्रबुद्ध पुरुष को असत् ही यह जगत्
देदीप्यमान मालूम होता हे वैसे ही परलोकगत पुरुष को चिदाकाश ही सर्गवत् प्रतीत होता हे । परलोकगत
पुरुष को अभूतपूर्व चिदाकाश ही द्युलोक, पृथिवी, यम आदि से युक्त पूर्वसिद्ध-सा व्याप्त प्रतीत होता
है । यहाँ मे मरा, फिर नारकीय जीव के रूप में उत्पन्न हुआ, यमलोक में आया और वहाँ पर शुभ-
अशुभ कर्मफलों को भोगता हूँ यों मृत पुरुष अतिनिबिड भ्रान्ति को देखता हे