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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 29–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

प्रत्येकं किल तत्रास्ति ब्रह्मचिन्मात्रतात्मनि । सर्वात्मिका सा यत्रास्ते यथान्तर्भाति तत्तथा ॥ २९ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यं किंचिन्न किंचिच्च सदप्यसत्यम् । स्थितं यथा यत्र तदात्म तत्र सर्वात्मभूर्भूततृणादिजातौ ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

मरण के पश्चात्‌ जगत्‌ के दर्शन में भी यही न्याय जानना चाहिये, ऐसा कहते हैं। जैसे चिदाकाश स्वप्ननगर को देखता है, जैसे संकल्पपुर को देखता है वैसे ही मरने के बाद जगत्‌ को देखता है जैसे सर्ग के आदि से अपृथिवीमय यह जगत्‌ पृथिवी आदिमय-सा भासता है वैसे ही मृत पुरुष का भी सम्पूर्ण जगत्‌ अपृथिवी आदिमय होता हुआ भी पृथिवी-आदिमय भासता है। जैसे तत्त्वज्ञानी के अथवा स्वप्न से जागे हुए पुरुष के स्वप्न के देश और काल जाग्रत्‌ सृष्टि से तनिक भी व्याप्त (सम्बद्ध) नहीं रहते वैसे ही परलोक प्राप्त पुरुष के भी एेहिक देश-काल वहाँ (परलोक मेँ) व्याप्त नहीं होते