Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
एतत्स्वसंकल्पपुरे यादृशं ते तथा स्थितम् ।
यथा संकल्पयसि यत्तत्तथा किल पश्यसि ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए लोग स्वप्न
ओर जाग्रत में देह का चेतयिता के (आत्मा के) रूप में ही अनुभव करते हैं अन्य यानी संवित् को
चेतयिता का (देहका) धर्म जानते हैं वह स्वयं चेतयित्री है ऐसा नहीं जानते हे । इसलिए कोई यानी
भ्रान्तिरूप संवित् ही शरीरता है उससे अन्य शरीरता नहीं हे