Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
यथैव वरशापाभ्यां शुद्धसंविदवाप्यते ।
संवित्तथैव भवति ब्राह्ममेवेति कल्पनम् ॥ ६ ॥
प्रजाविधिनिषेधाभ्यामेकयाऽऽस्थाव्यवस्थया ।
तथैव फलमाप्नोति ब्राह्ममेवेति कल्पनम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
आदि के तीन प्रश्नों का भी इसी तरह समाधान करना चाहिये, क्योकि जगत् की सिद्धि स्वेदन के
बलपर ही हुई है, इस आशय से कहते हैं।
सृष्टि के प्रारम्भ में समस्त कारणों का अभाव था, अतएव अवश्य आश्रय लेने योग्य स्वप्नद्रष्टा
संविदात्मा ही यों जगत् के रूप में भासता है । ऐसी अवस्था में इस जगत् में स्वप्नवैधर्म्यरूप अन्यता
कौन है यानी कोई नहीं है अर्थात् जगत् स्वप्नसदृश ही है । इस प्रकार जो ही ब्रह्मनामक निर्मल
संवेदन है, वही इस जगत् के रूप में भासता है, इसलिए जगत् में ब्रह्मभिन्नता कैसी ?