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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 208, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

देहिनो ये जगत्यस्मिंस्तान्प्रत्यनुपलम्भतः । असदासीज्जगत्पूर्वं सत्यमित्युपलभ्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सदा एकरस (कभी विकृत न होनेवाले) ब्रह्म की जगत्रूप से स्थिति होने के कारण जगत्‌ ब्रह्म ही है। विद्वान्‌, वेद और अध्यात्मशास्त्ररूप प्रमाणों से ऐसा ही हमने अनुभव किया है वही यहाँ पर कहा है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कहा है