Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एकस्य जीवितं पुंसः सुहृदा मरणं द्विषा ।
मृत्वार्थितं प्रयागादौ क्षेत्रे यत्तदिदं श्रृणु ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
-अनिच्छतेहितेदुरदेशान्तरगतैः फलम् । प्रजा प्राप्नोत्यसंबद्धैरमूर्तरत्र क क्रम: ॥* इस प्रश्न का
उत्तर सुनाने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजन्, प्रजाओं को अमूर्त, दूर स्थित अतएव सम्बंधरहित राजा की
आज्ञा आदि से अपने ही घर में जैसे शुभाशुभ फल (निग्रहानुग्रहरूप) प्राप्त होता है उसको सुनो,
मैं कहता हूँ
सर्ग सन्दर्भ
ढो सौ सातवाँ सर्ग समाप्त दोसौ आठवाँ सर्ग जैसे प्रजा दूर देश में स्थित प्रयत्नं से अन्यत्र वध, बंधन आदि फल पाती है वैसे ही ब्रह्मा की इच्छा का वर्णन ।