Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
संकल्पस्वप्नपुरयोर्या भ्रान्तिरनुभूयते ।
ततोऽधिकोऽयं न न्यूनाज्जाग्रत्स्वप्नेऽनुभूयते ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा विधिप्रतिषेधरूप शास्त्रों को सफल वनानेवाली लोकमर्यादा ही ब्रह्म में बद्धमूल है स्थित है
अतः वह दूर स्थित कर्मो के भी फल की कल्पना करती है, ऐसा कहते हैं।
विधि शास्त्र और निषेध शास्त्रों का लोकमर्यादा संरक्षण ही एकमात्र प्रयोजन है, लोकस्थिति ही,
जो ब्रह्म में उगी हुई है, मरकर परलोक में गये हुए पुरुष को फल देनेवाली है