Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
धर्माधर्मौ कथं ब्रह्मन्कारणं देहसंविदः ।
तस्यामूर्तौ कथं चैको द्विशरीरत्वमृच्छति ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तव में तो आत्मा के जन्म और मरण ही नहीं होते हैं, किन्तु आत्मा स्वयं ही भ्रान्तिवश जन्म
और मरण की कल्पना करता है, ऐसा कहते हैं।
ब्रह्म न तो कभी अस्त को प्राप्त होता है और न कभी उदित होता है । ब्रह्मचिदाभास सदा ही
आत्मा में स्थित है