Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
यथैव संकल्पपुरे यन्न संभवतीह हि ।
तन्नास्त्येव तदेतस्मिन्किं वाऽस्तु ब्रह्मकल्पने ॥ २२ ॥
स्वप्नसंकल्पपुरयोरेको गच्छति लक्षताम् ।
तथा चैकैव चित्स्वप्ने सेनात्वमुपगच्छति ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वैसे ही मरण भी पूवदिहभ्रान्ति के स्फुरण का उपसंहार ही है और कुछ नहीं है, दृश्य जगत् के
आकाश में स्फुरण और अस्फुरण अज्ञानउपहित चित् का स्वभाव ही है, ऐसा कहते हैं।
जब चिदाकाशस्वरूप जीव स्वभावतः स्फुरण का त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित होता है तब वह
शान्त (मृत) कहा जाता है जैसे ये स्पन्दन और अस्पन्दन वायु के स्वभाव ही हैं अन्य नहीं हैं वैसे ही
ये स्फुरण ओर अस्फुरण उस आत्मा के निर्मल और अक्षय स्वभाव ही हैं, अन्य नहीं हैं