Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
एवमेवमियं भ्रान्तिर्भाति भास्वन्नभोमयम् ।
नेह किंचन सन्नासन्न वाऽऽसदिह किंचन ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिद्घन
का यह स्पष्ट स्वभाव ही है कि यह स्वयं जिस जिसका संकल्प करता हे, क्षणभर में ही वहाँ पर वे
वे पदार्थ अपने अपने अवयवो के साथ तथा शक्ति, कार्य आदि भेद और कार्य परम्पराएँ एक बार
के संकल्प से ही सिद्ध हो जाती हैं