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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 209, Verses 28–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 209, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 209 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

यथानुभूयते यद्यत्तत्तथा तत्त्वदर्शिनः । प्रबुद्धस्यात्र किं नाम तत्स एवाङ्गतेत्यलम् ॥ २८ ॥ इह चेद्विहितो धर्मस्तत्स्वर्गेऽमृतपर्वताः । स्थिता इतीह संकल्पे कस्मान्न प्राप्तवान्गिरीन् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

संकल्पकल्पित पदार्थ स्वभाववश नानारूप से स्थित होने पर भी स्फुरणस्वभाव ब्रह्म में चिदात्मकरूप से भासते हैं इसी प्रकार स्वतः नाना आकारस्वभाववाले होने पर भी सद्रूप से एक तत्त्ववाले (एकाकार) स्थित हैं । उन पदार्थों में से प्रत्येक में अस्ति, भाति ओर प्रियरूप से ब्रह्मचिन्मात्रता है, क्योंकि चिति सर्वात्मक है जहाँ पर जैसे रहती हे वहाँ पर वैसी भासती है