Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
किमुच्यते ज्ञानबन्धुर्ज्ञानी चैव किमुच्यते ।
किं फलं ज्ञानबन्धुत्वे ज्ञानित्वेऽपि च किं फलम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, ज्ञानवन्धु किसे कहते हैं और ज्ञानी कौन कहा जाता है तथा
ज्ञानवन्धु होने मेँ कौन फल मिलता है ओर ज्ञानी होने में कौन फल मिलता है, यह सब आप
कृपाकर मुझे बतलाइए । प्रश्न करने का मेरा आशय यह है कि किस स्वरूप को प्राप्त करके
मनुष्य ज्ञानवंधु होता है ओर किस स्वरूप को प्राप्त करके ज्ञानी कहा जाता है तथा इन दोनों
के फल क्या हैं ? यह सब भलीभाँति मुझे बतलाइये