Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रं भोगाय शिल्पिवत् ।
यतते न त्वनुष्ठाने ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जो शास्त्रों को केवल अपने भोग के लिए शिल्पी की
तरह पढ़ता ओर उसकी व्याख्या करता है, परन्तु स्वयं जो ज्ञान के उपायभूत साधनचतुष्टय के
सम्पादन और मनन आदि में प्रयत्न नहीं करता वह पुरुष ज्ञानबन्धु कहा जाता है