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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

कर्मस्पन्देषु नो बोधः फलितो यस्य दृश्यते । बोधशिल्पोपजीवित्वाज्ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका शास्त्राभ्यासजनित शाब्दिक बोध भोग-व्यवहारों में वैराग्योपरम आदि फलों से फलित नहीं दीखता वह तत्त्वकथाओं द्वारा दूसरों को ठगने के लिए चातुर्यपूर्णं बोधरूपी शिल्पकारी से अपना जीवन निर्वाह करनेवाला होने से ज्ञानबन्धु कहा गया है