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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

आत्मज्ञानमनासाद्य ज्ञानान्तरलवेन ये । संतुष्टाः कष्टचेष्टं ते ते स्मृता ज्ञानबन्धवः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव उक तरह के ज्ञानावभास की प्राप्ति से सन्तुष्ट रहनेवालों में अशुभ ज्ञानबन्धुता ही है, यह कहते हैं। दुष्ट अभिमान आदि दोष तथा पारलौकिक अनर्थरूप फल के लिए कष्ट चेष्टापूर्वक कर्म करते हुए जो आत्मज्ञान को न प्राप्त कर अन्य ज्ञानलेश की प्राप्ति से सन्तुष्ट रहते हैं वे अशुभज्ञानबन्धु कहे गये हैं