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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

ज्ञानादितज्ज्ञेयविकाशशान्त्या विना न संतुष्टधियेह भाव्यम् । त्वं ज्ञानबन्धुत्वमुपेत्य राम रमस्व मा भोगभवामयेषु ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य ओर आभ्यन्तर विषयों की अनेक वृत्तिरूप अज्ञान, इन वृत्तियों के कारण एवं आश्रय प्रमाता तथा इनके शब्दादि विषय और इन विषयों के प्रकाश-इन सबकी आत्यन्तिक शान्ति से होनेवाली पूर्णानन्दैकरस, स्वप्रकाश, ब्रह्यात्मैक्य की प्रतिष्ठा के बिना सिर्फ अवान्तर भूमिकाओं के लाभ से “अब मैं कृतार्थ हो गया हूँ” इस तरह सन्तुष्टबुद्धि होकर उत्तरोत्तर भूमिकाओं में पहुँचानेवाले प्रयत्नं से मुमुक्षु पुरुष को यहाँ शिथिल नहीं हो जाना चाहिए । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सम्पूर्णं विद्याओं में कुशल होते हुए भी अध्यात्मशास्त्र को छोड़ करके अन्य शास्त्रों में चातुर्यपूर्ण आसक्ति से ज्ञान की उपेक्षा द्वारा या अनधिकारी पुरुषों में ज्ञानोपदेश देने के कौशल के प्रदर्शन के द्वारा ज्ञानवन्धुता को प्राप्तकर उस ख्यातिलाभ आदि के द्वारा भोगरूपी सांसारिक रोगों में रमण न कीजिये