Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 21, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अत्राहारार्थं कर्म कुर्यादनिन्द्यं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणार्थम् ।
प्राणाः संधार्यास्तत्त्वजिज्ञासनार्थं तत्त्वं जिज्ञास्यं येन भूयो न दुःखम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तब मुमु को किस तरह रहना चाहिए, इस पर कहते हैं /
इस संसार में मुमुक्षु पुरुष को अपने आहार की (हित, मित और मेध्य भोजन की) प्राप्ति
के लिए श्रुति-स्मृति तथा शिष्ट पुरुषों द्वारा अनुमोदित अनिन्द्य कर्म करना चाहिए तथा वह
आहार भी अपने प्राणों के धारण के लिए ही करना चाहिए एवं प्राणों का धारण तत्त्वजिज्ञासा
के लिए करना चाहिए और ऐसे तत्त्व की जिज्ञासा करनी चाहिए, जिससे कि फिर जन्म, मरण
आदि दुःख की प्राप्ति न हो