Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ज्ञानेन ज्ञेयनिष्ठत्वाद्योऽचित्तं चित्तमेव च ।
न बुध्यते कर्मफलं स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
शिष्य ज्ञान और उसका फल पहले बतलाया यया हैं, अब ज्ञानी वव किमुच्यते -ज्ानित्वेऽपि
व कि फलम्“ (ज्ञानी किसे कहते हैं और ज्ञानी बन जाने पर क्या फल होता हैं) इन प्रश्नों का उत्तर
कहने के लिए सबसे प्रथम ज्ञानी के लक्षण कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, क्रमशः एक-एक के पीछे दूसरी-तीसरी भूमिकाओं के
ऊपर चढ़ने से परिपक्व हुए तत्त्वज्ञान से ज्ञातव्य ब्रह्ममात्र में दृढ़ निष्ठा हो जाने के कारण जो पुरुष
प्रारब्ध फल को भोग करते हुए भी शब्द आदि विषयों को और शब्दादि विषयाकारों मे एवं काम-
संकल्पादि वृत्तियों में परिणत अन्तःकरण को वस्तुसत् नहीं समझता, (क्योंकि तत्त्वज्ञान से बाधित
हो जाने के कारण उनकी केवल अनुठृत्तिमात्र ही रहती है) वह ज्ञानी कहलाता है
सर्ग सन्दर्भ
इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बारईसवाँ सर्ग॑ सबसे पहले अनेक युक्क्ति-प्रयुक्तियों से ज्ञानियों के लक्षणों का वर्णन तथा प्रसंग से जीव, जगत् और ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन |