Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
फले क्षयेन्दुभारूपे प्राप्ते ध्यातृशतैर्नभः ।
यथा न शतपूर्णेन्दु तथेदं कथनं श्रृणु ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वांछित फल देनेवाले प्रयाग आदि क्षेत्र में एक ही पुरुष के मित्र ने उसके
दीर्घजीवन की प्रार्थना कर अन्तिम साँस छोडी और शत्रु ने उसके शीघ्र मरण की कामना कर मृत्यु
का आलिंगन किया यह दोनों की दीर्घ जीवन और शीघ्र मरणरूप विरुद्ध कामनाएँ कैसे सम्पन्न
होंगी ? यहाँ जो तुमने प्रश्न किया था, उसका उत्तर सुनो
सर्ग सन्दर्भ
दो सौ आठवाँ सर्ग समाप्त दोसौ नौवाँ सर्ग परस्पर विरुद्ध फल देनेवाले कर्मो के भोगोँ की एक साथ प्राप्ति होने से अविरोध द्वारा सफलता का युक्ति से साधन।