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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

चन्द्रबिम्बस्य ध्यातारः प्राप्ताः प्राप्तव्यसुस्थिताः । नेदं नभस्तलं प्राप्ता न चेमं शशिनं श्रिताः ॥ २ ॥ क्वेवान्यसंकल्पपुरमन्यः प्राप्नोति कथ्यताम् । संकल्पपुर्यामर्थाप्तिस्तज्जन्तावेव नापरे ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

राजन्‌, ब्रह्म ने सृष्टिरूप अपने संकल्पनगर में प्रयागादि सब कामनाप्रद क्षेत्रों तथा सब पदार्थों के फल का, उस अधिकारी पुरुष के लिए, संकल्प से समर्थन किया है । जिसमें (संकल्पनगर में) जिसकी (अधिकारी की) वांछित फल सिद्धि के लिए वांछित फल देनेवाले प्रयाग आदि पुण्यतीर्थं, उनमें किये गये स्नान, दान, तप, यज्ञ आदि पुण्य तथा उन दोनों से पुण्यतीर्थं ओर स्नानादि पुण्य से संस्कृत शरीर ये तीनों यदि शास्त्रानुकूल आचरण करनेवाले अधिकारी के हैं तो उसके द्वारा यहाँ पर मेरे द्वारा किये गये पुण्य से मेरा अभीष्ट फल अवश्य होगा यों विश्वास से अनुष्ठित प्रयाग मरण आदि से प्रार्थित फल अवश्य होता ही हे