Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
पृथक्पृथक्स्वसंकल्पसर्गखेष्वेव ते स्थिताः ।
चन्द्रास्तपन्ति तत्रैव कलाक्षयविवर्जिताः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
से क्या फल होता है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
पापी श्रद्धालु पुरुष का प्रयाग आदि पुण्य क्षेत्र के मरण से उत्पन्न चितिशक्तिरूप वह पुण्य
ब्रह्महत्यादि महापाप से अंशतः अथवा सम्पूर्णतः जैसा क्षेत्र का माहात्म्य हो, पुरुष को अलगकर स्वयं
भी शान्त हो जाता है, क्योकि “धर्मेण पापमपनुदति" (धर्म से पाप को नष्ट करता है) इत्यादि श्रुति
है