Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
विशेयमस्मिन्नेवेन्दाविनि ध्याता निशाकरे ।
अस्मिन्नेव विशत्यन्तरात्मबुद्धिसुखोज्झितः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शास्त्रों द्वारा शिक्षणीय (शिक्षाप्राप्तियोग्य) पुरुष में पाप की मात्रा कम हो और तीर्थक्षेत्र में
स्नान, दान आदि से होनेवाला धर्म अधिक मात्रा में हो तो वह उस पाप को निःशेष रूप से विनष्टकर
श्रुति द्वारा प्रतिपादित फल के विषय में अंशत: असर डालता ही है यानी उसे सिद्ध करता ही है