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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अहमिन्दुं प्रविष्टः स्यामिन्दुबिम्बसुखान्वितः । ध्यातेति तादृक्सुखभाग्भवतीति विनिश्चयः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे राजन्‌, लेकिन जहाँ पर शास्त्र द्वारा शिक्षणीय पुरुष का पाप पुण्यकषत्रार्जित धर्म के बराबर ही होता है वहाँ पर तुल्यबल होने के कारण उस धर्म से उस पाप की निवृत्ति नहीं हो सकती इसलिए पुण्य और पाप के भोग के लिए उसके दो शरीर और उनके चिदाभास दो भ्रान्ति और प्रतिभात्मक स्फुरित होते हैं