Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथायमनुसंधत्ते स्वभावं संविदव्यया ।
तं तथैवानुभवति भवेच्चेद्दृढनिश्चयः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
पापों और पुण्यों का महान् फलरूप इस प्रकार का जो जो जैसे ब्रह्म संकल्प से स्फुरित होता है वह वह
वैसे ही व्यवस्थित है, उसमें कुछ भी हेर-फेर नहीं हो सकता