Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
समस्तं कल्पनामात्रमिदमाद्यज्ञजन्मनः ।
शून्यमप्रतिघं शान्तं तेष्वपि स्यात्किमन्यथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इसका मरण जैसे प्रतिभारूप है वैसे ही इसके
बन्धुओं का भी मरने पर सर्वत्र प्रसिद्ध रोना, शव को ले जाना, श्मशान में जाना, जलाना आदि सब
कुछ धातुक्षोभवाले लोगों की (संनिपात से जिनके वायु, पित्त आदि धातु क्षुब्ध हो गये हैं ऐसे लोगों
की) तरह वैसी प्रतिभा ही है, यह समझना चाहिये