Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
य एव ब्रह्मशब्दार्थो देहशब्दार्थ एव सः ।
नार्थयोरनयोर्भेदो विद्यतेऽम्ब्वम्भसोरिव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
धर्म और अधर्म दोनों अमूर्त हैं, उन दोनों की मूर्तता कैसे ?“ इस प्रश्न को प्रस्तुत चर्चा के
अनुकूल युधारकर राजा फिर पूछता है।
हे ब्रह्मन्, धर्म और अधर्म ब्रह्म संवित् के कारण कैसे होते हैं ? धर्म-अधर्म दोनों जब अमूर्त हैं
मूर्तिमान् नहीं हैं तब उनमें से एक द्वितीय शरीर कैसे बन जाता है ?