Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
स्वप्नस्तवानुभूतार्थस्तेनातस्त्वं प्रबोध्यसे ।
न तु सर्गे चिदाभाते सादृश्यं स्वप्नभस्मना ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे हम लोगों के संकल्पनगर में ऐसा कोई
नहीं है जो संभव न हो सके वैसे ही इस ब्रह्म के संकल्पनगररूप त्रिलोकी में कुछ भी असंभव नहीं
है यानी सब कुछ हो सकता है