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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

कस्तत्र नाम देहोऽयं कस्यैते स्वप्नधीः क्व वा । स्वप्नेन ज्ञावबुद्धेन भ्रमेणाज्ञोऽवबोध्यते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्ननगर और संकल्पनगर में एक ही चिति लाखों रूप धारण करती है वैसे ही जाग्रत्स्वप्न में एक ही चिति महासेना के आकार को प्राप्त होती है