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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verses 24–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verses 24–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

तत्र जाग्रन्न च स्वप्नो न सुषुप्तं न चेतरत् । किमपीत्थमिदं भानं खमात्रं मौनमोमलम् ॥ २४ ॥ अभातमेव भातीव यदद्येत्थमिदं तु तत् । प्राग्विभातं तथात्यच्छं जाग्रत्स्वप्नादि नो यथा ॥ २५ ॥ देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः । तन्मयं सर्वमेवेदं द्वैतमद्वैतमेव च ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे चिति जाग्रत्‌ में एक से अनेक रूप होती है वैसे ही जहाँ पर लाखों एकरूप होते हैं वह सुषुप्ति भी वही होती है । एक ही चिति अनेकरूप होती है और अनेकरूप से एकरूपता को प्राप्त होती है इस बात का स्वप्न तथा संकल्प में अनुभूत सेना के स्मरण में, समूहरूप की एकाकारता में तथा "इदम्‌" के (यह के) स्थान में “तत्‌* (वह) कल्पना से अन्यथा अनुभव होता है, इत्यादि संकल्पनगर और स्वप्ननगर में किसको अनुभूत नहीं है इसलिए इस जगत्रूप चिदाकाशसंकल्प में क्या संभव नहीं है अथवा क्या संभव है