Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अन्यत्र चिन्मयं स्वप्नं द्वैताद्वैतं शुभाशुभम् ।
निरावरणचिन्मात्रनभसैवोपमीयते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार यह भ्रान्ति देदीप्यमान चिदाकाशमय ही
प्रतीत होती है यहाँ पर न कुछ सत् है, असत् है अथवा न सत् असत् है