Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 210, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 210, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 210 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
शून्यमर्थोपलम्भश्च भानं चाभानमेव च ।
द्वैतमैक्यमसत्सच्च सर्वं चिद्गगनं परम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस जिसका
जैसे अनुभव होता है वह वैसा ही है । तत्त्वदर्शी पुरुष को इस विषय में क्या असमंजस है ?