Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति तत्रोपविश्याहं पूजितस्तेन भूभुजा ।
प्रयोजनं स्वं संपाद्य स्वर्गन्तुं गगनं प्लुतः ॥ १ ॥
अद्यैतद्भवता प्रोक्तं मया मतिमतां वर ।
अनया सुदृशा शान्तमनाः स्वात्मा भविष्यसि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
दो सौ नौवाँ सर्गं समाप्त
दो सौ दसवाँ सर्ग
राजा प्रज्ञप्ति के शेष प्रश्नों के समाधान का निरूपण तथा
तत्त्वदृष्टि से देहादि जगत् की ब्रह्ममात्रता का निरूपण ।
खे स्यामक्षयपूर्ेन्दुरिति ध्मायिचितैः फलैः । तुल्यकालमनुप्राप्तैः सहय़रेन्दु किं नमः ॥
मैं आकाश में अक्षय पूर्ण चन्द्रमा होऊँ” इस कामना से ध्यान करनेवालो के संचित एक समय में
प्राप्त हुए चन्द्रत्वकूप फलों से आकाश एक साथ अनेक चन््रयुक्त क्यो नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर
पहले सुनाते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे राजन्, सैकड़ों ध्यान करनेवाले लोगों द्वारा अक्षय चन्द्रत्वरूप फल
प्राप्त होने पर जैसे आकाश सैकड़ों पूर्णचन्द्रों से युक्त नहीं होता उस प्रकार के इस मेरे कथन को
सुनो । यद्यपि सत्यचन्द्रबिम्ब का अहंभाव से ध्यान करनेवाले पुरुष प्राप्तव्य चन्द्रत्व में चिरकालीन
ध्यान से अन्य भाव का विस्मरण होने के कारण ऐन्दवों के उपाख्यान में उक्त ऐन्दवन्याय से सुस्थित
होकर चन्द्रत्व को प्राप्त ही हैं तथापि वे तो इस आकाशतल में प्राप्त हुए ओर न इस चन्द्र मे प्रविष्ट
हुए