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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 3–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verses 3–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मैव तदिदं सर्वं निर्नामैवामलं नभः । किमप्येवाजमाशान्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ३ ॥ चिद्भानमात्रमित्युक्तं ब्रह्मेति कलिताभिधम् । परात्परमिति प्रोक्तं तत्तु निर्नामकं पदम् ॥ ४ ॥ श्रीराम उवाच । सिद्धसाध्ययमब्रह्मविद्याधरदिवौकसाम् । ब्रह्मन्कथय दृश्यन्ते लोका लोकधराः कथम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यो आकाशतल में प्राप्त नहीं हुए ? इस पर कहते है । दूसरे के संकल्पनगर में दूसरा प्रविष्ट हो यह बात कहाँ देखी गई है यह बतलाओ। संकल्पनगर में पदार्थो की प्राप्ति उसी पुरुष को होगी जिसका कि वह संकल्पनगर है । अन्य के संकल्पनगर मेँ कदापि पदार्थो की उपलब्धि नहीं हो सकती हे । अलग अलग अपनी अपनी संकल्पसृष्टि के आकाशो में ही स्थित वे चन्द्रमा, जिनकी कला का कदापि क्षय नहीं होता है, वहीं पर प्रकाशित होते है । “इसी चन्द्रमा में मेँ प्रविष्ट होऊं" ऐसा ध्यान करनेवाला उपासक, जो कि अन्दर आत्मबुद्धिसुख से शून्य है, इसी चन्द्रमा में ही प्रविष्ट होता हे