Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 11–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
ध्यानेन त्वमपीतांश्चेत्स्थिरतां सुस्थिरात्मना ।
नयस्याशु तदेवैते स्थिरतां यान्त्यविघ्नतः ॥ ११ ॥
यथाभिमतविस्तारा यथाभिमतसंपदः ।
संकल्पभाववलितो जनः पश्यति सिद्धवत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जब यह हम लोगों का दृष्टिगोचर जगत् भी सारा का सारा
जन्मः सर्वज्ञ ब्रह्म की कल्पनामात्र, शून्य, निराकार ओर शान्त है तब उपासको द्वारा कल्पित जगतों में
क्या अन्यथा इससे विलक्षण सत्यता होगी जिससे वहाँ असमंजसता होगी, यह अर्थ हे