Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
किंतु ते स्थिरतां नीताः सिद्धैः स्वर्यानसंपदा ।
अस्थिरैर्ध्यानविश्रान्तौ तैर्दुःखैस्तदमी कृताः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
दानधमदितपसामौध्वदिहिककर्मणाम् । इहस्थानाममू्तनिं मूर्त परेत्याऽस्ति किं फलम् ॥
इस प्रश्न का अनुवाद कर समाधान करने की प्रतिज्ञा करते है ।
हे राजन्, दान, अन्त्येष्टि कर्म, तप, जप आदि मूर्तिरहित कर्मो का परलोक मेँ मूर्तिमान् फल
केसे होता है ? यह जो तुमने कहा उसका उत्तर यह कहा जाता है, सुनो दान आदि से अंकित
बुद्धिवाले अमूर्त जीव परलोक में स्वप्न के समान मूर्तिमान् से प्रतीत हो रहे अनुत्पन्न फल को, देखते
हैं जिसकी मूर्तिं के आकार की कल्पना चित् से ही की जाती है