Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथा वारिणि वर्तन्ते तरङ्गावर्तवृत्तयः ।
अनन्याः परिवर्तन्ते तथा ब्रह्मणि सृष्टयः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न का मुझे समझाने में कैसे उपयोग है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
स्वप्न का अर्थ तुम्हे अनुभूत है, इसलिये स्वप्न के द्वारा तुम्हें समझाया जाता है। स्वप्नरूप भस्म
के साथ (बाधित अर्थ के साथ) चिद्रूप से भासमान सृष्टि में सादृश्य कदापि नहीं है