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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

यथा वायौ परिस्पन्दा यथा व्योमनि शून्यता । अनन्याश्चाप्यमूर्ताश्च तथा ब्रह्मणि सृष्टयः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न में कौन यह देह है, किसके ये स्वाप्न पदार्थ हैं, अथवा कहाँ स्वप्न बुद्धि है ? ज्ञानी द्वारा अवबुद्ध भ्रमरूप स्वप्न से अज्ञानी को बोध कराया जाता है