Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
चिरानुभूतमप्यर्थकार्यपीदं जगत्त्रयम् ।
शून्यमेव निराकारं संकल्पनगरं यथा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो यह विश्व आज इस प्रकार
भासिता-सा दृष्टिगोचर होता है वह नहीं भासता है । सच्चिदानन्दरूप से पूर्व भास हुआ भी वह
स्वरूपतः वैसे ही (अभासा ही) हे । जाग्रत्, स्वप्न आदि जैसे कदापि हैं ही नहीं अत्यन्त निर्मल ब्रह्म
वैसा है