Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 211, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 35
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जब
चरमसाक्षात्कारवृत्तिरूप ज्ञान से सारा का सारा विश्व यथास्थित ही विलीन हो जाता है तब पहले
ब्रह्म भिन्नरूप से परिज्ञात विश्व ही इस प्रकार से (ब्रह्मरूप से) परिज्ञात होकर ब्रह्मता को प्राप्त
होता है