Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चित्त्वाद्ब्रह्मखमेवाहमिति वेत्तीव यस्त्वयम् ।
तदेव परमेष्ठित्वं तस्योदरमिदं जगत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, उस राजा के द्वारा पूजे गये मैंने वहाँ कुशद्वीप की इलावती
नगरी में बैठकर राजा प्रज्ञप्ति पर अनुग्रह करने का अपना प्रयोजन सिद्ध कर स्वर्ग में जाने के लिए
आकाशमार्ग का अवलम्बन किया
सर्ग सन्दर्भ
ढो सौ ढसवाँ सर्ग समाप्त दो सौ ग्यारहवाँ सर्ग सिद्ध, साध्य आदि के विविध लोकों के दर्शनों के उपाय के साथ सकल जगत् ब्रह्म ही है, यह पुनः वर्णन ।