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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

एवं स्थिते न च ब्रह्मा न च जातं जगत्स्थितम् । स्थितं यथास्थितमजं परं ब्रह्मैव पूर्ववत् ॥ २ ॥ संवित्तौ तु जगद्रूपं भासतेऽप्येवमेव तत् । मृगतृष्णेव मिथ्यैव दृश्यमानमपि त्वसत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मतिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, आज यहाँ अयोध्या नगरी में विद्यमान हो रहे मैंने आपसे यह कहा । यह सुन्दर दृष्टि रखने से शान्तमन होकर आप चिदाकाश हो जाओगे । कारण वाणी का अगम्य, अज, परमशान्त, आदि, मध्य ओर अन्त से शून्य है, इसलिए यह सब कुछ निःशब्द ब्रह्माकाश ही है