Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अतःप्रभृति शून्येयं भ्रान्तिरभ्युदिता नवा ।
कुतः केव किल भ्रान्तिर्ब्रह्मैव तदनामयम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो चित्स्फुरणरूप कहा गया है, जो ब्रह्म" यों कल्पित
नामवाला कहा गया हे, परात्पर कहा गया है, वह निर्नाम (शब्द की पहुँच से परे) पद हे