Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
जगद्ब्रह्मजलावर्तो द्वित्वैकत्वे किलात्र के ।
क्वावर्तपयसोर्द्वित्वं द्वित्वाभावात्क्व चैकता ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी
ने कहा : भगवन्, सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर ओर देवताओं के लोक ओर उनके निवासी लोग
कैसे दिखाई देते हैं, यह मुझको बतलाने की कृपा कीजिये